झांसी न्यूज डेस्क: बुंदेलखंड की करीब 600 साल पुरानी पारंपरिक चितेरी कला अब देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी अलग पहचान बना रही है। कभी केवल दीवारों और पारंपरिक सजावट तक सीमित रहने वाली यह कला अब आधुनिक उत्पादों के जरिए ऑनलाइन बाजारों में पहुंच चुकी है। बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों पर भी चितेरी कला से सजे उत्पाद उपलब्ध हैं, जिससे इस प्राचीन विरासत को नया मंच मिला है।
इस उपलब्धि के पीछे झांसी के बबीना ब्लॉक स्थित दुर्गापुरी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की मेहनत है। समूह से जुड़ी प्रतिभा डोंगरे ने चितेरी कला को आधुनिक स्वरूप देकर जूट बैग, होम डेकोर, मोमेंटो, पटका, स्टॉल और महिलाओं के हैंडबैग जैसे उत्पादों पर उकेरा। इन उत्पादों की मांग अब बुंदेलखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच चुकी है। जिले में आने वाले वीवीआईपी मेहमानों का स्वागत भी इन्हीं महिलाओं द्वारा तैयार किए गए मोमेंटो और पटकों से किया जाता है।
प्रतिभा डोंगरे ने इस पहल से 25 महिलाओं को रोजगार से जोड़ा है। इतना ही नहीं, समूह की महिलाएं आसपास की बालिकाओं को तीन महीने का निशुल्क सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण भी दे रही हैं, ताकि वे भी आत्मनिर्भर बन सकें। इस पहल से न सिर्फ महिलाओं की आय बढ़ी है, बल्कि नई पीढ़ी भी पारंपरिक कला से जुड़ रही है।
प्रतिभा डोंगरे का कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़ने के बाद उनके उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं, एनआरएलएम के जिला समन्वयक सुनील कुमार ने कहा कि यह पहल बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है।