झांसी न्यूज डेस्क: उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के भोजला गांव में जब महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर अपना प्लांट शुरू करने का फैसला किया, तो उनके परिवारों में सभी लोग इस फैसले से खुश नहीं थे। कुछ महिलाओं को घर पर विरोध का सामना करना पड़ा। वहीं, आर्थिक तंगी के कारण वे अपने बच्चों को मनचाही शिक्षा भी नहीं दिला पा रही थीं।
लेकिन आज इन महिलाओं की जिंदगी काफी बदल गई है। सरकारी मदद से शुरू किए गए उनके प्लांट में आंगनवाड़ियों में बांटे जाने वाले पोषण आहार तैयार किए जाते हैं। इससे उन्हें नियमित कमाई हो रही है। महिलाएं बताती हैं कि अब वे घर के खर्चों में हाथ बंटा पा रही हैं, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा रही हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि परिवार में उन्हें पहले से ज्यादा सम्मान मिलने लगा है।
भोजला ग्राम पंचायत में स्थित सक्षम प्रेरणा स्मॉल इंडस्ट्रीज यूनिट में 20 महिलाएं काम करती हैं। यहां आंगनवाड़ियों में भेजे जाने वाले खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इन महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह बनाकर छोटी-छोटी बचत से शुरुआत की और फिर मिलकर अपना कारोबार शुरू करने का फैसला किया।
स्वयं सहायता समूह से पोषण आहार प्लांट तक का सफर
शिव मंदिर स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष द्रौपदी ने बताया कि इस पहल की जानकारी उन्हें तब मिली, जब एक टीम उनके इलाके में आई और महिलाओं को सरकारी योजनाओं के बारे में बताया।
उन्होंने कहा, “शुरुआत में हमारे समूह में 10 महिलाएं जुड़ी थीं। बाद में यह समूह गांव के संगठन में बदला और फिर क्लस्टर स्तर पर एक फेडरेशन बनाया गया।”
गांव के संगठन का नाम नारी शक्ति प्रेरणा संगठन है, जबकि क्लस्टर स्तर पर बने फेडरेशन का नाम लक्ष्य प्रेरणा समिति, भोजला है।
इसके बाद महिलाओं को बताया गया कि गांव में टेक-होम राशन (टीएचआर) प्लांट लगाया जाना है। इसे शुरू करने के लिए हर महिला को अपने स्वयं सहायता समूह के जरिए 30 हजार रुपये देने थे। महिलाओं ने मिलकर पैसे जमा किए और प्लांट स्थापित किया गया।
द्रौपदी के मुताबिक, इस काम से उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है। अब नियमित कमाई होने से घर का खर्च चलाना आसान हो गया है और वे अपने बच्चों को बेहतर स्कूलों में पढ़ा पा रही हैं।
स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले वह सिलाई और खेती का काम करके अपना घर चलाती थीं। उस समय घर की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल होता था। परिवार के पास बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे।
उन्होंने कहा, “समूह से जुड़ने के बाद हमारी जिंदगी काफी बदल गई है।” द्रौपदी ने बताया कि जिन महिलाओं को पहले परिवार के विरोध का सामना करना पड़ता था, आज उन्हीं महिलाओं को घर में सम्मान मिलता है। उन्होंने महिलाओं को काम करने और कमाने का मौका देने के लिए राज्य सरकार का आभार भी जताया।
सरकारी स्कूल से प्राइवेट स्कूल तक पहुंचे बच्चे
बेहटा गांव की रहने वाली और जय मां रतन वाली स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष सरोज ने बताया कि प्लांट में आंगनवाड़ियों के बच्चों के लिए कई तरह के खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इनमें बेसन की बर्फी, बेसन का हलवा और मूंग दाल से बना दलिया शामिल है।
महिलाओं ने पहले स्वयं सहायता समूह के जरिए बचत की और फिर सरकारी मदद से प्लांट शुरू किया। सरोज ने बताया कि कमाई बढ़ने से अब वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर फैसले ले पा रही हैं।
उन्होंने कहा, “पहले हमारे बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। अब हम उन्हें प्राइवेट स्कूलों में भेज पा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हम अपने पैरों पर खड़ी हैं।”
महिलाओं के लिए यह कमाई सिर्फ घर के खर्च में मदद करने तक सीमित नहीं है। इससे उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने और परिवार की जरूरतों से जुड़े फैसले लेने का भी मौका मिला है।
‘पहले समूह से जुड़ने से रोका जाता था’
प्लांट में काम करने वाली एक अन्य महिला विनिता ने बताया कि आमतौर पर एक स्वयं सहायता समूह में 10 महिलाएं होती हैं। उनके इलाके में ऐसे 17 समूह सक्रिय हैं। इन समूहों से जुड़ी महिलाएं अलग-अलग तरह के काम करती हैं।
विनिता ने बताया कि शुरुआत में कुछ महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने से रोका जाता था। हालांकि, विरोध के बावजूद जो महिलाएं आगे बढ़ीं, वे धीरे-धीरे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गईं।
उन्होंने कहा, “पहले हम अपनी मर्जी से बाहर भी नहीं जा पाती थीं। समूह से जुड़ने और कमाई शुरू करने के बाद हमारी जिंदगी बदल गई। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हम आत्मनिर्भर बन पाएंगी।”
विनिता के मुताबिक, अब महिलाएं अपनी कमाई से पतियों की आय में योगदान देने के साथ-साथ घर के खर्च भी उठा रही हैं। जो परिवार पहले उनके समूह से जुड़ने का विरोध करते थे, अब वही उन्हें सम्मान देने लगे हैं।
भोजला गांव की इन महिलाओं की कहानी बताती है कि सामूहिक बचत, सरकारी मदद और रोजगार के अवसर ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी बदलने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। पोषण आहार प्लांट में काम करके महिलाएं न सिर्फ घर की आर्थिक स्थिति सुधार रही हैं, बल्कि अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने और परिवार में अपनी बात रखने की ताकत भी हासिल कर रही हैं।