झांसी न्यूज डेस्क: मध्य प्रदेश के दतिया जिले में 'ज्ञान भारतम मिशन' के तहत हुई एक महत्वपूर्ण खोज ने इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 75 वर्षीय पुजारी राधावल्लभ मिश्रा के घर से दो दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहरें मिली हैं, जो वर्षों से एक संदूक में सुरक्षित रखी गई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये खोजें भारतीय इतिहास के कई अनछुए पहलुओं पर नई रोशनी डाल सकती हैं।
पहली खोज लगभग 150 से 200 वर्ष पुराने एक दुर्लभ सामूहिक चित्र की है, जिसे 'पूना फोटोग्राफिक कंपनी' ने तैयार किया था। इस तस्वीर में ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के साथ बड़ौदा, मैसूर, इंदौर, ग्वालियर, जयपुर, त्रावणकोर और नागपुर सहित कई रियासतों के शासक तथा हैदराबाद के निजाम और उनके प्रधानमंत्री नवाब आसमान जाह दिखाई देते हैं। समय के प्रभाव से तस्वीर का निचला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है, जिसके कारण दो शासकों की पहचान अब संभव नहीं है। बताया जाता है कि राधावल्लभ मिश्रा ने यह तस्वीर करीब 50 वर्ष पहले एक फोटो फ्रेम की दुकान से प्राप्त की थी।
दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण खोज झांसी राज्य से जुड़े एक दुर्लभ पीतल के बैज की है। इस अंडाकार बैज पर 'चपरास श्री महाराजाधिराज झांसी संवत 1896' अंकित है, जो वर्ष 1840 ईस्वी का संकेत देता है। पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञों के अनुसार, यह बैज झांसी के राजा गंगाधर राव के शासनकाल का आधिकारिक प्रतीक है और रानी लक्ष्मीबाई से उनके विवाह से पहले की प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बैज झांसी रियासत का अब तक मिला पहला आधिकारिक प्रशासनिक चिह्न हो सकता है। हैरानी की बात यह है कि राधावल्लभ मिश्रा ने इसे लगभग 30 वर्ष पहले एक कबाड़ी की दुकान से मात्र 50 रुपये में खरीदा था। पुरातत्व विभाग का कहना है कि 'ज्ञान भारतम मिशन' के माध्यम से लोग अपनी पुरानी धरोहरों को सामने ला रहे हैं, जिससे देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने में मदद मिल रही है।