गरियाबंद: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में आयोजित 'मुख्यमंत्री सुशासन तिहार' शिविर उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व संसदीय सचिव गोवर्धन मांझी ने मंच से ही प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया। जिला कलेक्टर भगवान सिंह उइके और अन्य आला अधिकारियों की मौजूदगी में मांझी ने तीखे शब्दों में कहा कि जब अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन ही नहीं उठाएंगे, तो आम जनता की शिकायतों का निराकरण कैसे होगा।
मूलभूत सुविधाओं और कार्यप्रणाली पर प्रहार
गोवर्धन मांझी ने विशेष रूप से पानी और बिजली जैसी बुनियादी समस्याओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इन समस्याओं को लेकर आवेदन दे-देकर थक चुके हैं, लेकिन विभागों में उनकी सुनवाई नहीं हो रही।
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प्रशासनिक जवाबदेही: मांझी ने सीधे कलेक्टर की ओर मुखातिब होते हुए कहा, "कलेक्टर साहब, कम से कम फोन तो उठा लिया करें।" उन्होंने तर्क दिया कि कई छोटी समस्याओं का समाधान केवल संवाद और त्वरित निर्देश से संभव है, जिसके लिए जनता को दर-दर भटकना पड़ता है।
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शिविर की प्रभावशीलता: उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल टेंट और पंडाल लगाने से सुशासन नहीं आता। सरकार की योजनाएं अच्छी हैं, लेकिन जब तक सिस्टम में बैठे लोग जिम्मेदार नहीं होंगे, तब तक 'सुशासन तिहार' का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
व्यवस्थाओं की कमी और राजनीतिक गरमाहट
मंच से मांझी ने शिविर में जुटी कम भीड़ और खाली कुर्सियों पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने इसे प्रशासन की विफलता बताते हुए कहा कि पंडाल का खाली होना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनके क्रियान्वयन में गंभीरता का अभाव है।
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व्यवस्थागत खामियां: उन्होंने प्रशासन को सचेत किया कि केवल कागजों पर आंकड़े जुटाने के बजाय धरातल पर बदलाव दिखना चाहिए।
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जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा: पूर्व संसदीय सचिव ने जोर देकर कहा कि यदि जनप्रतिनिधियों की बात अनसुनी की जाएगी, तो यह सीधे तौर पर जनता की आवाज को दबाने जैसा है।
इस घटनाक्रम के बाद कार्यक्रम स्थल पर सन्नाटा पसर गया और प्रशासनिक अधिकारियों में हड़कंप मच गया। श्री मांझी के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की मंशा को जमीन पर उतारने के लिए प्रशासन को अपनी कार्यशैली में व्यापक सुधार करने की आवश्यकता है।